Oct 23, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 verse 52

Bhagwat Gita

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति |
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च || २ -  ५२ ||


जब तुम्हारीं बुद्धि अन्धकार से उप्पर उठ जाएगी तब क्या सुन चुके हो 
और क्या सुनने वाले है उससे तुम्हे कोई मतलब नहीं रहेगा  || २ – ५२  ||

Oct 20, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 Verses 46-50

Bhagwat Gita

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके  |
तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः || २ – ४६  ||

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || २ – ४७ ||

योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || २ – ४८  ||

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्ध्नञ्ज्य |
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः || २ - ४९ ||

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते |
तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् || २ – ५० ||


हर जगह पानी होने पर जितना सा काम ऐक कूँऐ का होता है,
उतना ही काम ज्ञानमंद को सभी वेदों से है॥मतलब यह की उस बुद्धिमान पुरुष के लिये
जो सत्य को जान चुका है, वेदों में बताये भोग प्राप्ती के कर्मों से कोई मतलब नहीं है॥ २ – ४६ ||


कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है लेकिन फल की इच्छा से कभी नहीं।
कर्म को फल के लिये मत करो और न ही काम न करने से जुड़ो॥ २ – ४७ ||


योग में स्थित रह कर कर्म करो, हे धनंजय, उससे बिना जुड़े हुऐ।
काम सफल हो न हो, दोनो में ऐक से रहो। इसी समता को योग कहते हैं॥ २ – ४८ ||


इस बुद्धी योग के द्वारा किया काम तो बहुत ऊँचा है। इस बुद्धि की शरण
लो। काम को फल कि इच्छा से करने वाले तो कंजूस होते हैं॥ २ – ४९ ||


इस बुद्धि से युक्त होकर तुम अच्छे और बुरे कर्म दोनो से छुटकारा पा लोगे।
इसलिये योग को धारण करो। यह योग ही काम करने में असली कुशलता है॥ २ – ५० || 


Bhagwat Gita Ch. 2 - verse 51

Bhagwat Gita

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः |
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः  पदं गच्छन्त्यनामयम् || २ -  ५१ ||


इस बुद्धि से युक्त होकर मुनि लोग किये हुए काम के फल को त्याग देते हैं |
इस प्रकार जन्म बंधन से मुक्त होकर वे दुःख से परे स्थान प्राप्त करते हैं || २ – ५१ ||

Sep 23, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 ~ verses 41-45

Bhagwat Gita

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन   |
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || २ – ४१  ||

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः |
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः || २ – ४२ ||

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति   || २ – ४३  ||

भोगैश्र्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते || २ - ४४ ||

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || २ - ४५ ||


इस धर्म का पालन करती बुद्धी ऐक ही जगह स्थिर रहती है।
लेकिन जिनकी बुद्धी इस धर्म में नहीं है वह अन्तहीन दिशाओं में बिखरी रहती है॥ २ – ४१ ||



हे पार्थ, जो घुमाई हुईं फूलों जैसीं बातें करते है, वेदों का भाषण करते हैं और
जिनके लिये उससे बढकर और कुछ नहीं है, जिनकी
आत्मा इच्छायों से जकड़ी हुई है और स्वर्ग जिनका मकस्द है वह ऍसे
कर्म करते हैं जिनका फल दूसरा जनम है। तरह तरह के कर्मों में फसे हुऐ और
भोग ऍश्वर्य की इच्छा करते हऐ वे ऍसे लोग ही ऐसे भाषणों की तरफ खिचते हैं॥ २ – ४२, ४३ ||



भोग ऍश्वर्य से जुड़े जिनकी बुद्धी हरी जा चुकी है, ऍसी बुद्धी कर्म योग
मे स्थिरता ग्रहण नहीं करती॥२ – ४४ ||



वेदों में तीन गुणो का व्यखान है। तुम इन तीनो गुणों का त्याग करो, हे अर्जुन।
द्वन्द्वता और भेदों से मुक्त हो। सत में खुद को स्थिर करो।
लाभ और रक्षा की चिंता छोड़ो और खुद में स्थित हो॥ २ – ४५ ||


Sep 18, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 ~ verses 36-40

Bhagwat Gita

अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः  |
निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुखतरं नु किम्  || २ – ३६ ||

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः || २ – ३७ ||

सुखदुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि  || २ – ३८  ||

एषा तेSभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |
बुद्ध्या युक्तो यथा पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || २ - ३९ ||

नेहाभिक्रमनाशोSस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || २ - ४० ||


अहित की कामना से बहुत ना बोलने लायक वाक्यों से तुम्हारे
विपक्षी तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करेंगें। इस से बढकर दुखदायी क्या होगा॥ २ – ३६ ||


यदि तुम युद्ध में मारे जाते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि जीतते हो
तो इस धरती को भोगोगे। इसलिये उठो, हे कौन्तेय, और निश्चय करके युद्ध करो॥ २ – ३७ ||


सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और हार को ऐक सा देखते हुऐ ही
युद्ध करो। ऍसा करते हुऐ तुम्हें पाप नहीं मिलेगा॥ २ – ३८ ||


यह मैने तुम्हें साँख्य योग की दृष्टी से बताया। अब तुम कर्म योग की दृष्टी से सुनो।
इस बुद्धी को धारण करके तुम कर्म के बन्धन से छुटकारा पा लोगे॥ २-३९ ||


न इसमें की गई मेहनत व्यर्थ जाती है और न ही इसमें कोई नुकसान होता है।
इस धर्म का जरा सा पालन करना भी महान डर से बचाता है॥ २ – ४० ||


Sep 14, 2015

Bhagwat Gita ch. 2 - verse 31-35

Bhagwat Gita

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि  |
धर्म्याद्धि युद्ध आच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते || २ – ३१ ||

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् |
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् || २ – ३२ ||

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |
ततः स्वधर्म कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि  || २ – ३३  ||

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेSव्यय्याम् |
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते || २ - ३४ ||

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां  महारथाः |
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्  || २ - ३५ ||


अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये
युद्ध से बढकर ऐक क्षत्रीय के लिये कुछ नहीं है॥ २ – ३१ ||


हे पार्थ, सुखी हैं वे क्षत्रिय जिन्हें ऐसा युद्ध मिलता है जो स्वयंम ही आया हो
और स्वर्ग का खुला दरवाजा हो॥ २ – ३२ ||


लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, को अपने धर्म और यश
की हानि करोगे और पाप प्राप्त करोगे॥ २ – ३३ ||


तुम्हारे अन्तहीन अपयश की लोग बातें करेंगे। ऐसी अकीर्ती एक प्रतीष्ठित
मनुष्य के लिये मृत्यु से भी बढ कर है॥ २ – ३४ ||


महारथी योद्धा तुम्हें युद्ध के भय से भागा समझेंगें।
जिनके मत में तुम ऊँचे हो, उन्हीं की नजरों में गिर जाओगे॥ २ – ३५ ||