Feb 14, 2009

हरिद्वार यात्रा,

हरिद्वार यात्रा,
जनवरी के आखरी दिन हरिद्वार जाने का मौका मिला। मौका भी ख़ास! मेरे बेटे का मुंडन !! ३१ जनवरी को दिन १:३० अपराह्न को अपनी गाड़ी निकली घर से चलपड़े हरिद्वार की तरफ़ । साथ में थे मेरे पापा मम्मी और बेटा "राघव"। राघव की मम्मी को तो हमने उसके स्कूल से लिया। रास्ते में से अपनी बहन और भांजे को बैठा लिया और गाड़ी चल दी मेरठ रोड पे। रास्ते में हम उत्तर प्रदेश तकनिकी विश्व विद्यालय से संबधित तकनिकी एवं प्रबंधन संस्थान गिनते जा रहे थे गिनती २० के बाद बंद कर दी । खतौली पहुंचे तो पता चला मुख्य मार्ग पे जाम लगा हुआ है। एक बार तो लगा हम हरिद्वार जा ही नहीं पाएंगे पर कुछ स्थानीय लोगो ने एक और रास्ता बताया जो गंगा नहर के साथ साथ था , डरते डरते गाड़ी उसी रास्ते पर चला दी। रास्ता अच्छा था कुछ दूर चलने पर हमने नहर के किनारे लंच किया। शाम होते होते हम बहादराबाद पहुँच गए। अब यह सोचा गया की पहले अपने प्लाट पे चला जाए जो
बहादराबाद के पास ही था। सो हम अपने प्लाट पे होते हुए हरिद्वार की तरफ़ चल दिए इतने और दिन ढल गया। अब हमें यह डर सता रहा था की गाड़ी कहाँ पार्क करेंगे और होटल कहाँ मिलेगा। पापा ने कहा हर की पौडी के पास में ही अप्पर रोड पे होटल हैं। यह देख के अच्छा लगा की गाड़ी हर की पौडी तक ही पहुँच गई और हमें होटल भी वहीँ मिल गया । पता चला की आरती तो ख़तम हो चुकी है सो अब हमारे पास खाना खाने के अलावा कोई काम नहीं था सो पास ही के एक भोजनालय में खाना खाया। फ़िर दूध पीने के लिए आधा बाज़ार घूमना पड़ा जब जाके दूध वाला मिला। पेट पूजा करके हम सब अपने कमरे में आके रजाई में घुस गये


बाकी अगली कड़ी में ॥


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सौरभ शर्मा

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