Mar 3, 2009

बसंत ऋतु

बसंत ऋतु चल रही है और मेरा दिल तो पागल है जो यह कुछ कुछ सोचता है । दिल कहता है बसंत में तो हर तरफ़ बसंती रंग बहार छा जाती है। अब इसको मैं समझा समझा के थक चुका हूँ कि यह सब पुराने ज़माने कि बातें हैं ऑर्थोडॉक्स दिलों की!!! अब खेतों में सरसों नहीं बिल्डिंग दिखाई देती हैं। जम्मू कश्मीर में तो केसर कब का अपना रंग बन्दूक के डर के कारण छोरचुका है। अब लड़कियां "रंग दे बसंती दुपट्टा" कह ही नहीं सकती, क्योंकि अब तो जमाना पिंक पैंटी का है। अब बच्चे फूलों के खेतों में नहीं, कंप्यूटर पे खेलते हैं। अब लड़कियां पानी भरने पनघट पे नहीं जाती वोह तो पब जाती हैं। लड़कों को लड़कियों को छेड़ने से फुर्सत मिले तो कुछ और सोचे!!

दिल तो पर कहता है कि होली तो अब भी होती है अब उसको कैसे समझाऊं अब होली मिलने मिलाने और दुश्मनी भुलाने का त्यौहार ना होके गूंदागर्दी करने का दिन है शराब पी के लड़कियों को छेड़ने का दिन है।

पता नहीं बसंत ऋतु फ़िर से हर्षौल्लास, उमंग की ऋतु कब बनेगी या कभी बनेगी भी या नहीं !!!!!!!!

जिज्ञासु
सौरभ शर्मा