Mar 12, 2009

होली जो हो ली

होली भी हो ली अब। मैंने कैसे बने होली ?....... चलो बताता हूँ। कल सुबह सुबह उठ के नहा के पूजा की और नाश्ता किया ( यहाँ ख़तम नहीं होती, फ़िल्म अभी बाकि है मेरे दोस्त ... :-) )
ठंडी हवा को देखते हुए हर बार की तरह यह सोचा की अबकी बार कोई रंग और पानी नहीं बस दूकान जा के चंदन और गुलाल लेके आगया। अभी तो होली वाले कपड़े ( यार कोई ख़ास कपड़े नहीं बस थोड़े पुराने कपड़े) पहने भी नहीं थे की पड़ोसी आगये होली खेलने...
सभी अपने से बड़े लोगो के चंदन का टीका लगा के आशीर्वाद लिया गया और अपने बराबर वाले और छोटो को गुलाल लगाया गया। फ़िर ध्यान आय अयार अभी तो अपनी धर्मपत्नी और बेटे के साथ भी होली नहीं खेली तो पहले मम्मी पापा , पत्नी और बेटे को चंदन लगा के होली की मुबारकबाद दी। तभी नीचे से हमारे किराये पे रहने वाले भाई भाभी आगये उन्होंने तो बस पानी की बाल्टी भरी और दाल दिया मेरे और पत्नी के उप्पर ... ठण्ड में भीग गये सारे...
फ़िर तो हमें भी जोश आगया ठण्ड को भूल कर पिछले साल वाले रंग की डिब्बी ढूंढी और हम भी लग गये दुसरे लोगो को भिगोने और रंग लगाने ...
११ बज चुके थे की तभी याद आया की मेरी चचेरी बहन जिसकी दिसम्बर में शादी हुई थी की शादी के बाद पहली होली है और हमारे बहनोई आयेंगे होली खेलने सो हम सपत्नीक उनके घर ही चल दिए मोटर साइकिल पे। वहां पहुँच के पता चला की वोह तो अभी आए ही नहीं डर के मारे । उनको फ़ोन मिला के बुलाया गया उनको कुछ खिला पिला के होली के लिए तैयार किया गया। फ़िर तो उनकी जो गत बनाई बस पूछो मत। उनके शरीर का जो भी हिस्सा दिख रहा था वोह सब रंग जा चुका था । १:३० बज चुके थे हम सब भी थक चुके थे तो होली को वहीं विराम दिया गया और कांजी और पकोडे खा के अपने घर को आगये। घर आके नहा धो के सो गये ...... इस तरह हमने होली मनाई । आशा है आप सब की होली खुशी और उल्लास के साथ हो ली होगी ।

सौरभ शर्मा