Jul 30, 2009

वृक्ष और नर नारी



पुरूष (नर) और नारी में जो भिन्नता है उसको समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। अगर दोनों को हम वृक्ष के जैसा समझे तो वोह वृक्ष जो झुकते नहीं है तन के खड़े रहते हैं वोह नर और जो झुक जाते हैं वोह नारी । मेरी इस उपमा को स्वीकार करते हो?

कौन से वृक्ष झुकते हैं ? - जो फलों से लदे होते हैं और नारी को ही फल यानि बच्चे होते हैं , और विभिन्न परिस्तिथियों में नारी ही झुकती हैं। परन्तु नर तन कर परिस्तिथियों का सामना करते हैं । सो नर और नारी को वृक्ष से रूपित करना सही हैं ना !!!!!

परन्तु यह हम सब जानते हैं कि जब आंधी आती हैं तो जो वृक्ष झुकते नहीं हैं वोह टूट जाते हैं जबकि जो वृक्ष फलों से लदे होते हैं और झुक जाते हैं वोह आंधी को सह जाते हैं । उसी तरह जब आंधी जैसी विकट परिस्तिथि आती हैं तो नारी तो सह जाती हैं परन्तु हम नर उसको सह नहीं पाते। उन परिस्तिथियों में हमें शक्ति स्वरूपा नारी के पास ही जाना पड़ता हैं ।

कैसी लगी आपको यह उपमा ?

आपका जिज्ञासु
सौरभ शर्मा

Jul 24, 2009

एक कविता -- दूसरे ब्लॉग से

मैं ऐसे ही चिट्ठो को पढ़ रहा था की एक कविता ने मन मोह लिया और कुछ सोचने पे मजबूर किया । ब्लॉग का यहाँहै एड्रेस

कविता ये है :-

हे राम,तुम कौन हो,
एक कवि की कल्पना,
या इस देश के दुर्भाग्य की अल्पना,
कौन हो तुम प्रमाण चाहिये,
तुम्हारे होने का सूक्ष्म ही सही,
इतिहास में कुछ परिमाण चाहिये,
ऐतिहासिक प्रमाणों के बिना हम कुछ भी नहीं मानेंगे,
यदि इतिहास में दर्ज नहीं होगा तो अपने बाप को भी बाप नहीं मानेंगे,
क्यों नहीं कराया अपने पैदा होने का रजिस्ट्रेशन,
बिना मतलब में करा दिया इतना फ्रस्ट्रेशन,
पता नहीं बाल्मीकि ने तुमको कहां से खोज लिया
और तुलसी ने क्यों रच दिया एक ग्रन्थ,
संभवत: साम्प्रदायिकता की भट्टी में झोंकना चाहते थे ये कवि,
और लोकतन्त्र में गद्दी हडपना चाहते थे ये सभी,
इसीलिये रचना कर दी राम की,
कल्पना की उडान तो देखिये, न काज की न काम की,
बापू तुम्हें भी कोई और नहीं मिला,
और धर्मों के भी ईश्वर थे,किसी को भी चुन लेते,हमें इस पचडे में डाल कर तुम्हें क्या मिला,
तुम तो सबसे बडे धर्म निरपेक्ष थे,
मानवता के सापेक्ष थे,
तुम्हें भी नहीं सूझा और कोई नाम,
अन्तिम समय में भी बोल गये हे राम,
और राम ने भी क्या दिया,
राम-जन्म भूमि विवाद,
दंगा और फसाद,
एक पुल,
जो है पुराना कुछ एक हजार साल,
पुरानी चीजों को स्टोर करेंगे,तो बदबू ही पायेंगे,
परिवर्तन संसार का नियम है,
नया पुल बनता
है तो कमीशन तो कम से कम मिलता है,
राम को जपेंगे तो क्या पायेंगे,
सारे वोट तो धर्म-निरपेक्षी ले जायेंगे,
दूसरों के भगवान भगवान हैं, अपने तो हैं बस एक कल्पना,
जिसके लिये क्या कलपना,
राम कौन सा वोट दिला देंगे,
कौन सा चुनाव जिता देंगे,
क्या बनवा देंगे पार्षद, सांसद या विधायक,
इसलिये हे नालायक,
बन्द कर जपना राम का नाम,
सुबह और शाम।


साभार : इंडियन सिटिज़न

क्या आपको भी कुछ सोचने पर मजबूर करती है ???

जिज्ञासु
सौरभ शर्मा

Jul 20, 2009

कांवड़ यात्रा और भक्ति

आज कल कांवड़ यात्रा का जोर है यह यात्रा हरिद्वार से गंगा जल ले कर शुरू होती है और श्रावण मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दर्शी तिथि को शिवलिंग पर गंगा जल अर्पित करने पर ख़तम होती है। इस दौरान दिल्ली - हरिद्वार राज मार्ग पर वाहनों का आना जाना निषिद्ध होता है। केवल कांवड़ यात्री ही इस मार्ग का उपयोग कर सकते हैं । दिल्ली में भी कई मुख्य मार्ग इसी वजह से बंद होते हैं की यात्रियों को कोई असुविधा न है। बड़ी ही भक्ति पूर्ण यात्रा है यह अगर भक्ति के साथ की जाए तो।

हमारे मोहल्ले की ऐसे सभी लड़के जो कुछ नहीं करते हैं और निट्ठल्ले घुमते हैं श्रावण महीना आते ही व्यस्त हो जाते हैं और यात्रा पे निकल जाते हैं। उनके माता पिता शान्ति की साँस लेते हैं की चलो कभी तो पूजा पाठ की तरफ़ ध्यान दिया बेटे ने (या इसलिए की चलो कुछ दिन तो शान्ति से गुजरेंगे !!) ऐसे लोगों का एक ही मकसद होता है की मजे करो। लोगो से अपनी खातिर दारी करवाओ और मौका मिले तो दंगा करो।

पहले के लोगों में भक्ति होती थी, मेरे मामा जी १० साल पहले कांवड़ लाते थे और बोलते थे की हम लोग गाँवों से दूर दूर खेतों से ही जाते थे ताकि कोई हमारी सेवा करके हमारा पुण्य न बाँट ले । उस समय किसी से सेवा करवाना यानि अपना पुण्य बाँट लेना होता था । कष्ट उठा के यात्रा करने से मन भगवान् में ही लगा रहता था । पर आज कल तो यात्री सेवा करवाने में मजे लेते हैं । और अगर कहीं उनको कष्ट उठाना पड़ जाए तो हंगामा कर देते हैं जैसे वोह हम पर एहसान कर रहें है कांवड़ ला कर ।

ऐसी कांवड़ लाने कोई फायदा ? ?

आपका जिज्ञासु
सौरभ शर्मा

Jul 6, 2009

आधुनिक भारत के युवा।

कल हम कुछ लोग फ़िल्म देखने के लिए सिनेमा हाल गए। फ़िल्म का नाम था "कम्बक्त इश्क " । इसलिए जाहिर है की युवा ही ज्यादा थे दर्शकों में। फ़िल्म शुरू होने से पहले एक विज्ञापन आया की राष्ट्र गान के लिए खड़े हो जाईये। और यह देख के की पूरा हाल खड़ा हो गया अपने राष्ट्र गान के लिए , मन खिल उठा । गर्व महसूस हुआ की हाँ हम भारत माता की संतान है ... और हम में अपने देश और अपने सैनिकों के लिए इज्जत है ।

क्या हम हाल के बाहर भी राष्ट्र गान के सम्मान में खड़े होंगे ????

आपका जिज्ञासु
सौरभ शर्मा