Jul 20, 2009

कांवड़ यात्रा और भक्ति

आज कल कांवड़ यात्रा का जोर है यह यात्रा हरिद्वार से गंगा जल ले कर शुरू होती है और श्रावण मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दर्शी तिथि को शिवलिंग पर गंगा जल अर्पित करने पर ख़तम होती है। इस दौरान दिल्ली - हरिद्वार राज मार्ग पर वाहनों का आना जाना निषिद्ध होता है। केवल कांवड़ यात्री ही इस मार्ग का उपयोग कर सकते हैं । दिल्ली में भी कई मुख्य मार्ग इसी वजह से बंद होते हैं की यात्रियों को कोई असुविधा न है। बड़ी ही भक्ति पूर्ण यात्रा है यह अगर भक्ति के साथ की जाए तो।

हमारे मोहल्ले की ऐसे सभी लड़के जो कुछ नहीं करते हैं और निट्ठल्ले घुमते हैं श्रावण महीना आते ही व्यस्त हो जाते हैं और यात्रा पे निकल जाते हैं। उनके माता पिता शान्ति की साँस लेते हैं की चलो कभी तो पूजा पाठ की तरफ़ ध्यान दिया बेटे ने (या इसलिए की चलो कुछ दिन तो शान्ति से गुजरेंगे !!) ऐसे लोगों का एक ही मकसद होता है की मजे करो। लोगो से अपनी खातिर दारी करवाओ और मौका मिले तो दंगा करो।

पहले के लोगों में भक्ति होती थी, मेरे मामा जी १० साल पहले कांवड़ लाते थे और बोलते थे की हम लोग गाँवों से दूर दूर खेतों से ही जाते थे ताकि कोई हमारी सेवा करके हमारा पुण्य न बाँट ले । उस समय किसी से सेवा करवाना यानि अपना पुण्य बाँट लेना होता था । कष्ट उठा के यात्रा करने से मन भगवान् में ही लगा रहता था । पर आज कल तो यात्री सेवा करवाने में मजे लेते हैं । और अगर कहीं उनको कष्ट उठाना पड़ जाए तो हंगामा कर देते हैं जैसे वोह हम पर एहसान कर रहें है कांवड़ ला कर ।

ऐसी कांवड़ लाने कोई फायदा ? ?

आपका जिज्ञासु
सौरभ शर्मा