Jul 24, 2009

एक कविता -- दूसरे ब्लॉग से

मैं ऐसे ही चिट्ठो को पढ़ रहा था की एक कविता ने मन मोह लिया और कुछ सोचने पे मजबूर किया । ब्लॉग का यहाँहै एड्रेस

कविता ये है :-

हे राम,तुम कौन हो,
एक कवि की कल्पना,
या इस देश के दुर्भाग्य की अल्पना,
कौन हो तुम प्रमाण चाहिये,
तुम्हारे होने का सूक्ष्म ही सही,
इतिहास में कुछ परिमाण चाहिये,
ऐतिहासिक प्रमाणों के बिना हम कुछ भी नहीं मानेंगे,
यदि इतिहास में दर्ज नहीं होगा तो अपने बाप को भी बाप नहीं मानेंगे,
क्यों नहीं कराया अपने पैदा होने का रजिस्ट्रेशन,
बिना मतलब में करा दिया इतना फ्रस्ट्रेशन,
पता नहीं बाल्मीकि ने तुमको कहां से खोज लिया
और तुलसी ने क्यों रच दिया एक ग्रन्थ,
संभवत: साम्प्रदायिकता की भट्टी में झोंकना चाहते थे ये कवि,
और लोकतन्त्र में गद्दी हडपना चाहते थे ये सभी,
इसीलिये रचना कर दी राम की,
कल्पना की उडान तो देखिये, न काज की न काम की,
बापू तुम्हें भी कोई और नहीं मिला,
और धर्मों के भी ईश्वर थे,किसी को भी चुन लेते,हमें इस पचडे में डाल कर तुम्हें क्या मिला,
तुम तो सबसे बडे धर्म निरपेक्ष थे,
मानवता के सापेक्ष थे,
तुम्हें भी नहीं सूझा और कोई नाम,
अन्तिम समय में भी बोल गये हे राम,
और राम ने भी क्या दिया,
राम-जन्म भूमि विवाद,
दंगा और फसाद,
एक पुल,
जो है पुराना कुछ एक हजार साल,
पुरानी चीजों को स्टोर करेंगे,तो बदबू ही पायेंगे,
परिवर्तन संसार का नियम है,
नया पुल बनता
है तो कमीशन तो कम से कम मिलता है,
राम को जपेंगे तो क्या पायेंगे,
सारे वोट तो धर्म-निरपेक्षी ले जायेंगे,
दूसरों के भगवान भगवान हैं, अपने तो हैं बस एक कल्पना,
जिसके लिये क्या कलपना,
राम कौन सा वोट दिला देंगे,
कौन सा चुनाव जिता देंगे,
क्या बनवा देंगे पार्षद, सांसद या विधायक,
इसलिये हे नालायक,
बन्द कर जपना राम का नाम,
सुबह और शाम।


साभार : इंडियन सिटिज़न

क्या आपको भी कुछ सोचने पर मजबूर करती है ???

जिज्ञासु
सौरभ शर्मा