Jul 31, 2015

Bhagwat Gita Ch. 1 - verse 36

Bhagwat Gita

पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः |
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् सबान्धवान् |
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव || ३६ ||

इन आततायिनों को मार कर हमें पाप ही प्राप्त होगा। इसलिये धृतराष्ट्र के पुत्रो तथा अपने अन्य संबन्धियों को मारना हमारे लिये उचित नहीं है। हे माधव, अपने ही स्वजनों को मार कर हमें किस प्रकार सुख प्राप्त हो सकता है।
|| १ – ३६ ||

गुरु पूर्णिमा





गुरु पूर्णिमा


अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

चिन्मयं व्यापियत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

त्सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजित पदाम्बुजः ।

वेदान्ताम्बुजसूर्योयः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥




चैतन्यः शाश्वतःशान्तो व्योमातीतो निरंजनः ।


बिन्दुनाद कलातीतः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

ज्ञानशक्तिसमारूढः तत्त्वमालाविभूषितः ।

भुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अनेकजन्मसंप्राप्त कर्मबन्धविदाहिने ।

आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

शोषणं भवसिन्धोश्च ज्ञापणं सारसंपदः ।

गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः ।

तत्त्वज्ञानात्परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


मन्नाथः श्रीजगन्नाथः मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः ।

मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम् ।

गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥

Jul 30, 2015

Bhagwad Gita Ch. 1 - verse 32 - 35

Bhagwad Gita
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैजीर्वितेन वा |
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च  || ३२ ||
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च |
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः || ३३ ||
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा |
ऐतान्न हन्तुमिच्छामि ध्नतोsपि मधुसूदन || ३४ ||
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीक्रुते |
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन || ३५ ||

हे गोविंद, (अपने प्रिय जनों की हत्या कर) हमें राज्य से, या भोगों से, यहाँ तक की जीवन से भी क्या लाभ है। जिन के लिये ही हम राज्य, भोग तथा सुख और धन की कामना करें, वे ही इस युद्ध में अपने प्राणों की बलि चढने को त्यार यहाँ अवस्थित हैं। गुरुजन, पिता जन, पुत्र, तथा पितामहा, मातुल, ससुर, पौत्र, साले आदि सभी संबन्धि यहाँ प्रस्तुत हैं। हे मधुसूदन। इन्हें हम त्रैलोक्य के राज के लिये भी नहीं मारना चाहेंगें, फिर इस धरती के लिये तो बात  ही क्या है, चाहे ये हमें मार भी दें। धृतराष्ट्र के इन पुत्रों को मार कर हमें भला क्या प्रसन्नता प्राप्त होगी हे जनार्दन।
|| १ – ३२, ३३, ३४, ३५ || 

Jul 29, 2015

Bhagwad Gita Ch. 1 - verse 31

Bhagwad Gita

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे |
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च  || ३१ ||

मुझे अपने ही स्वजनों को मारने में किसी भी प्रकार का कल्याण दिखाई नहीं देता। हे कृष्ण, मुझे विजय, या राज्य और सुखों की इच्छा नहीं है।  || १ – ३१ ||

Jul 28, 2015

Bhagwad Gita Ch. 1 – Verse 30

Bhagwad Gita

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः |
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव || ३० ||

मैं अवस्थित रहने में अशक्त हो गया हूँ, मेरा मन भ्रमित हो रहा है। हे केशव, जो निमित्त है उसे में भी मुझे विपरीत ही दिखाई दे रहे हैं || १ – ३० ||

Jul 27, 2015

Bhagwad Gita Ch. 1 - verse 29

Bhagwad Gita

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते |
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते || २९ ||

मेरा शरीर काँपने लगा है, मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष गिरने को है, और मेरी सारी त्वचा मानो आग में जल उठी है। || १ – २९ ||

Jul 24, 2015

Bhagwad Gita ch. 1 verse 28

Bhagwad Gita

अर्जुन अवाच

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् |
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति || २८ ||

अर्जुन बोले:
हे कृष्ण, मैं अपने लोगों को युद्ध के लिये तत्पर यहाँ खडा देख रहा हूँ। || १ – २६ ||

Jul 23, 2015

Bhagwad Gita Ch. 1 - Verse 27

Bhagwad Gita

तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान् |
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् || २७ ||

इस प्रकार अपने सगे संबन्धियों और मित्रों को युद्ध में उपस्थित देख अर्जुन का मन करुणा पूर्ण हो उठा और उसने विषाद पूर्वक कृष्ण भगवान से यह कहा। || १ – २७ ||