Jul 30, 2015

Bhagwad Gita Ch. 1 - verse 32 - 35

Bhagwad Gita
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैजीर्वितेन वा |
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च  || ३२ ||
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च |
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः || ३३ ||
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा |
ऐतान्न हन्तुमिच्छामि ध्नतोsपि मधुसूदन || ३४ ||
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीक्रुते |
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन || ३५ ||

हे गोविंद, (अपने प्रिय जनों की हत्या कर) हमें राज्य से, या भोगों से, यहाँ तक की जीवन से भी क्या लाभ है। जिन के लिये ही हम राज्य, भोग तथा सुख और धन की कामना करें, वे ही इस युद्ध में अपने प्राणों की बलि चढने को त्यार यहाँ अवस्थित हैं। गुरुजन, पिता जन, पुत्र, तथा पितामहा, मातुल, ससुर, पौत्र, साले आदि सभी संबन्धि यहाँ प्रस्तुत हैं। हे मधुसूदन। इन्हें हम त्रैलोक्य के राज के लिये भी नहीं मारना चाहेंगें, फिर इस धरती के लिये तो बात  ही क्या है, चाहे ये हमें मार भी दें। धृतराष्ट्र के इन पुत्रों को मार कर हमें भला क्या प्रसन्नता प्राप्त होगी हे जनार्दन।
|| १ – ३२, ३३, ३४, ३५ ||