Aug 30, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 ~ 3,4,5

Bhagwat Gita


क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते |
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं तयक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || २ – ३ ||

तुम्हारे लिये इस दुर्बलता का साथ लेना ठीक नहीं।
इस नीच भाव, हृदय की दुर्बलता, का त्याग करके उठो हे परन्तप || २ – ३ ||

अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन |
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन || २ - ४ ||

अर्जुन बोले,
हे अरिसूदन, मैं किस प्रकार भीष्म, संख्य और द्रोण से युध करुँगा।
वे तो मेरी पूजा के हकदार हैं २ – ४ ||

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् || २ – ५ ||


इन महानुभाव गुरुयों की हत्या से तो भीख माँग कर जीना ही बेहतर होगा।
इन को मारकर जो भोग हमें प्राप्त होंगे वे सब तो खून से रँगे होंगे  २ – ५ ||