Sep 3, 2015

Bhagwat Gita Ch. 1 - verse 11-15

Bhagwat Gita
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः  || २ - ११ ||

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः |
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् || २ – १२ ||

देहिनोsस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || २ – १३ ||

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोsनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || २ -१४ ||

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ |
समदुखसुखं धीरं सोsमृतत्वाय कल्पते || २-१५ ||

श्रीभगवान बोले
जिन के लिये शोक नहीं करना चाहिये उनके लिये तुम शोक कर रहे
हो और बोल तुम बुद्धीमानों की तरहँ रहे हो। 
ज्ञानी लोग उन के लिये शोक करते है जो चले गऐ और उन के लिये जो हैं || २ – ११ ||


 न तुम्हारा न मेरा और न ही यह राजा जो दिख रहे हैं इनका कभी नाश होता है॥
और यह भी नहीं की हम भविष्य मे नहीं रहेंगे॥ २ – १२ ||

आत्मा जैसे देह के बाल, युवा यां बूढे होने पर भी वैसी ही रहती है
उसी प्रकार देह का अन्त होने पर भी वैसी ही रहती है॥बुद्धीमान लोग इस पर
व्यथित नहीं होते॥ २ – १३ ||


हे कौन्तेय, सरदी गरमी सुखः दुखः यह सब तो केवल स्पर्श मात्र हैं।
आते जाते रहते हैं, हमेशा नहीं रहते, इन्हें सहन करो, हे भारत॥ २ – १४ ||


हे पुरुषर्षभ, वह धीर पुरुष जो इनसे व्यथित नहीं होता, जो दुख और सुख में
एक सा रहता है, वह अमरता के लायक हो जाता है॥ २ – १५ ||