Sep 4, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 ~ verse 16-20

Bhagwat Gita

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः |
उभयोरपि दुष्टोsन्तस्त्व्नयोस्तत्वदर्शिभिः || २ - १६ ||

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् |
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति || २ – १७ ||

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः |
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युध्यस्व भारत || २ – १८ ||

या एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् |
उभौ तौ विजानीतो नायं हन्ति न हन्तये || २ -१९ ||

न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |
अजो नित्यं शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे  || २ - २० ||

न असत कभी रहता है और सत न रहे ऐसा हो नहीं सकता।
इन होनो की ही असलीयत वह देख चुके हैं जो सार को देखते हैं॥ २ – १६ ||


तुम यह जानो कि उसका नाश नहीं किया जा सकता जिसमे यह सब कुछ स्थित है।
क्योंकि जो अमर है उसका नाश करना किसी के बस में नहीं॥ २ – १७ ||


यह देह तो मरणशील है, लेकिन शरीर में बैठने वाला अन्तहीन कहा जाता है।
इस आत्मा का न तो अन्त है और न ही इसका कोई मेल है, इसलिऐ युद्ध करो हे भारत॥२ – १८ ||


जो इसे मारने वाला जानता है या फिर जो इसे मरा मानता है,
वह दोनों ही नहीं जानते। यह न मारती है और न मरती है॥ २ – १९ ||


यह न कभी पैदा होती है और न कभी मरती है। यह तो अजन्मी,
अन्तहीन, शाश्वत और अमर है। सदा से है, कब से है। शरीर के मरने
पर भी इसका अन्त नहीं होता॥ २ – २० ||