Sep 14, 2015

Bhagwat Gita ch. 2 - verse 31-35

Bhagwat Gita

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि  |
धर्म्याद्धि युद्ध आच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते || २ – ३१ ||

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् |
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् || २ – ३२ ||

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |
ततः स्वधर्म कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि  || २ – ३३  ||

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेSव्यय्याम् |
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते || २ - ३४ ||

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां  महारथाः |
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्  || २ - ३५ ||


अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये
युद्ध से बढकर ऐक क्षत्रीय के लिये कुछ नहीं है॥ २ – ३१ ||


हे पार्थ, सुखी हैं वे क्षत्रिय जिन्हें ऐसा युद्ध मिलता है जो स्वयंम ही आया हो
और स्वर्ग का खुला दरवाजा हो॥ २ – ३२ ||


लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, को अपने धर्म और यश
की हानि करोगे और पाप प्राप्त करोगे॥ २ – ३३ ||


तुम्हारे अन्तहीन अपयश की लोग बातें करेंगे। ऐसी अकीर्ती एक प्रतीष्ठित
मनुष्य के लिये मृत्यु से भी बढ कर है॥ २ – ३४ ||


महारथी योद्धा तुम्हें युद्ध के भय से भागा समझेंगें।
जिनके मत में तुम ऊँचे हो, उन्हीं की नजरों में गिर जाओगे॥ २ – ३५ ||