Sep 8, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 ~ verses 21 - 25

Bhagwat Gita

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् |
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् || २ – २१ ||

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवमि गृह्णातिनरोsपराणि  |
तथा शरीराणि विहाय जिर्णान्य न्यानि संयाति नवानि देहि || २ – २२ ||

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः|
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः || २ – २३  ||

अच्छेद्योSयमदाह्योSयमक्लेद्योSशोष्य एव च |
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः || २ - २४ ||

 अव्यक्तोSयमचिन्त्योSयमविकार्योSयमुच्यते  |
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि  || २ - २५ ||

हे पार्थ, जो पुरुष इसे अविनाशी, अमर और जन्महीन, विकारहीन जानता है,
वह किसी को कैसे मार सकता है यां खुद भी कैसे मर सकता है || २ – २१ ||


जैसे कोई व्यक्ती पुराने कपड़े उतार कर नऐ कपड़े पहनता है,
वैसे ही शरीर धारण की हुई आत्मा पुराना शरीर त्याग कर
नया शरीर प्राप्त करती है॥ २ – २२ ||


न शस्त्र इसे काट सकते हैं और न ही आग इसे जला सकती है।
न पानी इसे भिगो सकता है और न ही हवा इसे सुखा सकती है॥ २ – २३ ||



यह अछेद्य है, जलाई नहीं जा सकती, भिगोई नहीं जा सकती, सुखाई नहीं जा सकती।
यह हमेशा रहने वाली है, हर जगह है, स्थिर है, अन्तहीन है॥ २ – २४ ||



यह दिखती नहीं है, न इसे समझा जा सकता है। यह बदलाव से
रहित है, ऐसा कहा जाता है। इसलिये इसे ऐसा जान कर तुम्हें शोक
नहीं करना चाहिऐ॥ २ – २५ ||