Sep 10, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 ~ Verses 26-30

Bhagwat Gita

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्  |
तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि || २ – २६ ||

जातस्य हि ध्रुर्वो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || २ – २७ ||

अव्यक्तादिनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || २ – २८  ||

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम् आश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः |
आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || २ - २९ ||

देहि नित्यमवध्योSयं देहे सर्वस्य भारत |
तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि  || २ - ३० ||


हे महाबाहो, अगर तुम इसे बार बार जन्म लेती और बार बार मरती भी मानो,
तब भी, तुम्हें शोक नहीं करना चाहिऐ॥ २ – २६ ||


क्योंकि जिसने जन्म लिया है, उसका मरना निष्चित है। मरने वाले का जन्म भी तय है।
जिसके बारे में कुछ किया नहीं जा सकता उसके बारे तुम्हें शोक नहीं करना चाहिऐ॥ २ – २७ ||


हे भारत, जीव शुरू में अव्यक्त, मध्य में व्यक्त और मृत्यु के बाद फिर
अव्यक्त हो जाते हैं। इस में दुखी होने की क्या बात है॥ २ – २८ ||


कोई इसे आश्चर्य से देखता है, कोई इसके बारे में आश्चर्य से बताता है,
और कोई इसके बारे में आश्चर्यचित होकर सुनता है, लेकिन सुनने के बाद भी
कोई इसे नहीं जानता॥ २ – २९ ||


हे भारत, हर देह में जो आत्मा है वह नित्य है, उसका वध नहीं किया जा सकता।
इसलिये किसी भी जीव के लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये॥ २ – ३० ||