Sep 18, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 ~ verses 36-40

Bhagwat Gita

अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः  |
निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुखतरं नु किम्  || २ – ३६ ||

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः || २ – ३७ ||

सुखदुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि  || २ – ३८  ||

एषा तेSभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |
बुद्ध्या युक्तो यथा पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || २ - ३९ ||

नेहाभिक्रमनाशोSस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || २ - ४० ||


अहित की कामना से बहुत ना बोलने लायक वाक्यों से तुम्हारे
विपक्षी तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करेंगें। इस से बढकर दुखदायी क्या होगा॥ २ – ३६ ||


यदि तुम युद्ध में मारे जाते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि जीतते हो
तो इस धरती को भोगोगे। इसलिये उठो, हे कौन्तेय, और निश्चय करके युद्ध करो॥ २ – ३७ ||


सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और हार को ऐक सा देखते हुऐ ही
युद्ध करो। ऍसा करते हुऐ तुम्हें पाप नहीं मिलेगा॥ २ – ३८ ||


यह मैने तुम्हें साँख्य योग की दृष्टी से बताया। अब तुम कर्म योग की दृष्टी से सुनो।
इस बुद्धी को धारण करके तुम कर्म के बन्धन से छुटकारा पा लोगे॥ २-३९ ||


न इसमें की गई मेहनत व्यर्थ जाती है और न ही इसमें कोई नुकसान होता है।
इस धर्म का जरा सा पालन करना भी महान डर से बचाता है॥ २ – ४० ||