Sep 23, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 ~ verses 41-45

Bhagwat Gita

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन   |
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || २ – ४१  ||

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः |
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः || २ – ४२ ||

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति   || २ – ४३  ||

भोगैश्र्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते || २ - ४४ ||

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || २ - ४५ ||


इस धर्म का पालन करती बुद्धी ऐक ही जगह स्थिर रहती है।
लेकिन जिनकी बुद्धी इस धर्म में नहीं है वह अन्तहीन दिशाओं में बिखरी रहती है॥ २ – ४१ ||



हे पार्थ, जो घुमाई हुईं फूलों जैसीं बातें करते है, वेदों का भाषण करते हैं और
जिनके लिये उससे बढकर और कुछ नहीं है, जिनकी
आत्मा इच्छायों से जकड़ी हुई है और स्वर्ग जिनका मकस्द है वह ऍसे
कर्म करते हैं जिनका फल दूसरा जनम है। तरह तरह के कर्मों में फसे हुऐ और
भोग ऍश्वर्य की इच्छा करते हऐ वे ऍसे लोग ही ऐसे भाषणों की तरफ खिचते हैं॥ २ – ४२, ४३ ||



भोग ऍश्वर्य से जुड़े जिनकी बुद्धी हरी जा चुकी है, ऍसी बुद्धी कर्म योग
मे स्थिरता ग्रहण नहीं करती॥२ – ४४ ||



वेदों में तीन गुणो का व्यखान है। तुम इन तीनो गुणों का त्याग करो, हे अर्जुन।
द्वन्द्वता और भेदों से मुक्त हो। सत में खुद को स्थिर करो।
लाभ और रक्षा की चिंता छोड़ो और खुद में स्थित हो॥ २ – ४५ ||