Sep 2, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 - verses 6,7,8,9,10

Bhagwat Gita

 न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः |
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्रा:   || २ - ६ ||

कार्पण्यंदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वाम् धर्मसंमूढचेताः |
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रुहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वाम् प्रपन्नम् || २ – ७ ||

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणां |
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || २ – ८ ||

संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशे: परन्तपः |
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह || २ – ९ ||

तमुवाच हृषीकेश: प्रहसन्निव भारत |
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः || २ – १० ||

हम तो यह भी नहीं जानते की हम जीतेंगे याँ नहीं
और यह भी नहीं की दोनो में से बेहतर क्या है
उनका जीतना या हमारा,

क्योंकि जिन्हें मार कर हम जीना भी नहीं चाहेंगे 
वही धार्तराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़ें हैं २ – ६ ||


इस दुख चिंता ने मेरे स्वभाव को छीन लिया है
 और मेरा मन शंका से घिरकर सही धर्म को नहीं हेख पा रहा है। 

मैं आप से पूछता हूँ
जो मेरे लिये निष्चित प्रकार से अच्छा हो वही मुझे बताइये

मैं आप का शिष्य हूँ और आप की ही शरण लेता हूँ॥ २ – ७ ||


जो मेरी इन्द्रीयों को सुखा रहा है, अन्त हो सकता है
भले ही मुझे इस भूमी पर अति समृद्ध और शत्रुहीन

राज्य या देवतायों का भी राज्यपद क्यों न मिल जाऐ ॥   २- ८ ||
संजय बोले

हृषिकेश
श्री गोविन्द जी को परन्तप अर्जुन
गुडाकेश यह कह कर चुप हो गये कि मैं युध नहीं करुँगा॥ २ – ९ ||



हे भारत, दो सेनाओं के बीच में शोक और दुख से 
घिरे अर्जुन को प्रसन्नता से हृषीकेश ने यह बोला॥ २ – १० ||