Oct 20, 2015

Bhagwat Gita Ch. 2 Verses 46-50

Bhagwat Gita

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके  |
तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः || २ – ४६  ||

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || २ – ४७ ||

योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || २ – ४८  ||

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्ध्नञ्ज्य |
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः || २ - ४९ ||

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते |
तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् || २ – ५० ||


हर जगह पानी होने पर जितना सा काम ऐक कूँऐ का होता है,
उतना ही काम ज्ञानमंद को सभी वेदों से है॥मतलब यह की उस बुद्धिमान पुरुष के लिये
जो सत्य को जान चुका है, वेदों में बताये भोग प्राप्ती के कर्मों से कोई मतलब नहीं है॥ २ – ४६ ||


कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है लेकिन फल की इच्छा से कभी नहीं।
कर्म को फल के लिये मत करो और न ही काम न करने से जुड़ो॥ २ – ४७ ||


योग में स्थित रह कर कर्म करो, हे धनंजय, उससे बिना जुड़े हुऐ।
काम सफल हो न हो, दोनो में ऐक से रहो। इसी समता को योग कहते हैं॥ २ – ४८ ||


इस बुद्धी योग के द्वारा किया काम तो बहुत ऊँचा है। इस बुद्धि की शरण
लो। काम को फल कि इच्छा से करने वाले तो कंजूस होते हैं॥ २ – ४९ ||


इस बुद्धि से युक्त होकर तुम अच्छे और बुरे कर्म दोनो से छुटकारा पा लोगे।
इसलिये योग को धारण करो। यह योग ही काम करने में असली कुशलता है॥ २ – ५० ||